पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच मतदाता सूची को लेकर उठे विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट ने अहम हस्तक्षेप किया है। लाखों लंबित अपीलों के बीच अदालत ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि कोई भी पात्र नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित न रहे।

दरअसल, राज्य में मतदाता सूची से नाम हटाने और आपत्तियों से जुड़े करीब 34 लाख मामलों पर फैसला लंबित था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए एक स्पष्ट समयसीमा तय की है, ताकि चुनाव प्रक्रिया प्रभावित न हो और योग्य मतदाता वोट डाल सकें।


कैसे मिलेगा वोट देने का अधिकार?

कोर्ट के निर्देश के मुताबिक:

  • जिन अपीलों पर स्पेशल अपीलेट ट्रिब्यूनल 21 अप्रैल तक फैसला दे देंगे, वे मतदाता 23 अप्रैल को पहले चरण में वोट डाल सकेंगे।
  • वहीं, 27 अप्रैल तक जिन मामलों का निपटारा होगा, वे 29 अप्रैल को दूसरे चरण में मतदान कर पाएंगे।

इसके लिए चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया है कि ऐसे मतदाताओं के नाम सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट में शामिल किए जाएं, ताकि उन्हें समय रहते मतदान का मौका मिल सके।


“वोटिंग सिर्फ अधिकार नहीं, भावना भी”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मतदान का अधिकार केवल संवैधानिक ही नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अधिकार भी है। इस फैसले के जरिए अदालत ने चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने पर जोर दिया है।


ममता बनर्जी ने जताई खुशी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए न्यायपालिका पर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि वे लगातार लोगों से धैर्य रखने की अपील कर रही थीं और अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कई लोगों को राहत मिलेगी।

ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि जिन लोगों ने अपील की है, उनके मामलों पर तय समयसीमा में फैसला होगा और उनके नाम वोटर लिस्ट में शामिल किए जाएंगे। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर गर्व है।


लोकतंत्र की कसौटी पर फैसला

इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि चुनाव सिर्फ प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकार और भरोसे से जुड़ा मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से लाखों मतदाताओं को राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं चुनावी पारदर्शिता पर भी एक मजबूत संदेश गया है।

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Rehan Fajal

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